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आज मई दिवस है। यानी की श्रमिक दिवस। वो दिन जो श्रम को सम्मानित करता है। उन लोगों को प्रोत्साहित करता है जो मेहनतकश हैं, जो की खून-पसीना-दिमाग-दिल लगा कर सबके जीवन को और भी जीने योग्य बनाते हैं, साधनो को साध्य बनाते हैं। निश्चय ही इस दिन को ‘मनाया’ जाना चाहिए, ‘सेलीब्रेट’ करना चाहिए। अच्छे श्रमिकों को पुरस्कृत किया जाना चाहिए जिस से उनका और दूसरों का कर्मठता में हौसला बना रहे, उत्साहित हो कर वो अपनी कार्य-क्षमता को और बढ़ाने को प्रयत्नशील हों। और हम ऐसा करने की चेष्टा भी करते हैं। इसी लिए, इस उपलख्क्ष्य में कल लाखों रैलियाँ निकाली जाएंगी, जाने कौन कौन, किस किस कुर्सी पर विराजमान हर स्तर के स्टार लोग भाषण देंगे, मंचो पर विभिन्न श्रेणी के कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, राजनैतिक पार्टियां अपने लुभावने प्रत्याशियों के हाथों इनाम बटवाते हुये फोटो खिंचवाएँगी और अखबारों में छपवाएंगी, शिलान्यास से लेकर पौधा-रोपण तक, बर्तन से लेकर साड़ी तक – क्या कुछ नहीं लुटाया जाएगा, उधर श्रम संगठनों और लेबर यूनियनो के लीडर अपने साथियों के साथ नारेबाजी करते हुये बैनर लेकर जुलूस  निकालेंगे, लंबे लंबे आंकलनों और आंकड़ों वाले उबाऊ लेख प्रकाशित होंगे, लोग गर्मी में हलकान होते हुये इन सब आयोजनो-प्रयोजनो का हिस्सा बनेंगे और एक दिवस धूम-धाम से सम्पन्न होगा।

ऐसे ही सम्मान-समारोह की बानगी यहाँ पेश है। मेरी माँ भी एक श्रमिक की भांति सारा दिन घर में खटती रहती हैं। परंतु समाज का नज़रिया एक गृहणी के श्रम के लिए सिर्फ ‘एक माँ का फर्ज़’ के दायरे में ही सिमट के रह जाता है सो रहने दीजिये उस विषय-बिन्दु की बात, वो फिर किसी और दिन। हाँ तो हुआ यूं की आस-पड़ोस की कुछ अति-सक्रिय महिलाओं ने माँ को धर-दबोचा की क्या घर में ही काम से दो-चार होती रहती हो! ज़रा घर से निकल कर समाज की ज़िम्मेदारी भी समझो और अपने फर्ज़ अदा करो। अब आप को ये ज़रा स्पष्ट कर दूँ की ऐसा तो नहीं है की घर समाज का हिस्सा नहीं है या की मेरी माँ सामाजिक प्राणी नहीं हैं। ना ही वो कभी घर-घूसड़ू रहीं, हर स्थानीय समस्या और मुद्दे को उन्होने समझा और जहां जैसे संभव हुआ, उस संबंधित व्यक्ति तक समाज के उस मुद्दे को पहुंचाया जहां या तो विशुद्ध बेवकूफी हो रही थी या फिर अनपढ़ों सी नासमझी, या फिर गरमा-गर्मी में ही बात पिघल कर रह जाती थी । अक्सर संबंधित अधिकारी तक न पहुँच कर लोग आलस में और उदासीनता में जिन बातों की उपेक्षा करते रहे हैं, मेरी माँ ने उस विधायक या अफसर या मेयर तक उस बात को समझाया जो की एक पढ़े-लिखे समझदार व्यक्ति से अपेक्षित होता है !

मगर मैं जिन स्त्रियों की बात कर रही हूँ, वो इन विशेषताओं को नहीं समझतीं। ये वो हैं की जिन में से एक के पति केन्द्रीय विद्यालय के रिटायर्ड प्रिंसिपल हैं, दूसरी मोहतरमा के पति सिंचाई विभाग में एक ऊंचे पद पर हैं, एक अन्य मैडम हैं जो की सैन्य अफसरों की माताजी हैं… इत्यादि इत्यादि और यही सब परिवार न तो पेड़ों के गिरे हुये सूखे पत्तों की ढेरी को आग लगाने में देरी करता है, न होली पर टायर जलाने से गुरेज, पर्यावरण जाये भाड़ में !

सो इन सब देवियों मे तय किया की अबकी बार ये अपनी अति-लोकप्रिय संस्था, जिसकी शाखाएँ हिंदुस्तान के लगभग सभी शहरों में अपनी जड़ें जमाये हैं, और  जिसके, खास मौकों पर खास तरीके के आयोजन होते रहते हैं (कैसे? ये फिर कभी तफतीश से! 😛 ), उसी संस्था के ‘श्रमिक-प्रोत्साहन’ के लिए आयोजित अति- विशिष्ट कार्यक्रम के उपलक्ष्य में वो हमारे घर से भी चंदा लेंगी ही।  अब जब दे रहे हो चंदा तो फिर तन-मन-धन से समर्पण को करना ही होगा, डुबकी तो लगानी ही होगी, चाहे कितनी ही मैली हो गंगा !

इन कार्यक्रमों की विशेषता ये होती है की ये आपको अलग-थलग न महसूस करा कर आपको इसमें स-शरीर खींच लेते हैं। जैसा की आपने देखा होगा की मेले का टिकिट लेते हैं तो जाना भी होता है, फिर उसमें समान की दुकान पर रुक कर अपनी पहचान वाले सज्जन (शायद वही जिनकी बिटिया आपको टिकिट बेच गयी थी) का सम्मान भी करना होता है और फिर कबाड़ से बनी हुयी बेकार की वस्तु खरीद कर अपनी जेब को ढीला करना होता है। सिली हुयी जेब फटने को तैयार हो जाती है और फालतू चीज़ घर मे खिजाने को सज़ जाती है। ठीक उसी प्रकार से, आपको न सिर्फ समाज की सेवा करने वालों को इनाम देने के लिए अपनी जेब ढीली करनी है बल्कि अपने साथ अपना एक कर्मचारी (माली, सफाई-वाला/वाली, बर्तन-वाली वगैरह में से कोई) को भी ले जाना है । क्यूँ? जिस से की उनको, आपके पैसे से खरीदे गए स्टील के टिफ़िन बांटे जा सकें, सब छोले-भटूरे की एक दावत उड़ा सकें और जिससे की वह लोकप्रिय संस्था अगले दिन अखबार में अपने कारनामे और उनको करने वाले खास चुनिंदा नाम(चीन?) कारिंदों (जो की उस संस्था के स्थानीय डाइरेक्टर इत्यादि हैं) की दिलदारी की खबर फोटो सहित छपवा कर, और अधिक लोकप्रिय हो सके, अधिक सफल कहला सके ।

आया न मज़ा पढ़ के? आपका पैसा, आपका कर्मचारी, और मजे सबके! कैसे?? वो ऐसे की भाई जब आपसे जबर्दस्ती की  मैम्बरशिप के लिए 500 रुपए जाएँ, साथ में 190/- अलग से आपकी इस भागीदारी के लिए जिसमें की भोजन और भजन शामिल होगा तथा एक 70/- का स्टील का कटोरदान आपके कर्मचारी के लिए आयेगा।

फिर आप अपने अति-व्यस्त कर्मचारी से ढेरों मिन्नतें कर के, उसे चार दूसरे प्रलोभन दे कर मान-मनौव्वल कर अपने साथ ले जाएंगे (क्यूंकी किसी भी कर्मचारी या मेहरी या जमादार को  तैयार न  कर पाने में भी आपकी किरकिरी होनी तय है) । वो नाक-भौं सिकोड़ता, अपनी व्यस्तता की दुहाई दे कर नखरे दिखाता, आपके साथ अगर चला भी जाएगा तो किस्सा यहीं खत्म नहीं हो जाएगा !

वहाँ सभी सम्मान-जनक और सम्माननीय लोगों की अपनी अपनी दिल की भड़ास (अर्थात इस सुअवसर पर हर एक मेम्बर को पान की पीक से सने दांतों से मुसकुराते हुये, अभिवादन करते हुये अपना और संस्था की उपलब्धियों का, देश सेवा की त्वरित भावना, उसमें योगदान, तथा इस दिवस की महत्ता का रटा-रटाया, कागज के पुर्जे पर लिखा हुआ राग अलापने के बाद) एक एक करके, हर मेम्बर की महत्ता के हिसाब से उतनी देर तक मंच पर उनकी उपस्थिति को फोटू में दर्ज़ करते हुये जब आपका (याने की आपके कर्मचारी का) नंबर आयेगा, तब तक न तो उनकी नकल में खीसें निपोरने के लिएआप में दम  बचा होगा न धैर्य! पोर पोर दुखती हड्डी से उठ   कर जब आप मंच पर जाएंगे और अपनी थकी हुयी आँखों से अपने कर्मचारी को सामने आने के लिए ढूँढेंगे तो शायद ये जान कर आपके होश उड़ जाएँ की वो कब का अपने समय की बर्बादी को बड़बड़ाता हुआ वहाँ से जा चुका है ! अगर वो वहाँ टिका भी है तो वो आपके बेजा ताली बजा बजा के दुखते हाथों के इशारे पर बुलाने से वहाँ आ तो जाएगा पर साथ ही आँखों से आग उगलेगा और सत्तर रुपए के टिफ़िन पे मुंह से सत्तर बड़बड़ाटे और बात सुनाएगा। उसका वहाँ खड़े रहने का एहसान आप पर, उसकी बर्बाद दिहाड़ी का कर्ज़ आप पर और इस स्थिति में दोनों तरफ से शर्मसार आप ! तिस पर तुर्रा ये की ‘अजी इस बीस रूपल्ली की टिफ़िन की किसे जरूरत है मेमसाब, मुझे तो सरकार से पगार बेहतर मिलती है (या फिर की मेरी बिना टैक्स की घर घर से वसूली कमाई बेहतर है न की आपका ये समय बर्बाद उपहार ) , इसका तो ढक्कन  ही हाथ लगाते ही चटक गया!’

आ गया न मज़ा!

पर अगर हम व्यंग्य को एक तरफ रखें तो बात उसकी ठीक ही तो है! इस बेमतलब आयोजन में सिवाय आयोजन-कर्ता के, और किसका लाभ था? देने वाला अपनी जेब से गया, लेने वाले को मुनाफा न हुआ, वो खर्चा किस काम का? एक मेहनतकश आदमी, अपना काम-धंधा छोड़ कर खड़ा रहा, सिर्फ इसलिए की उसको उसी काम के लिए एक भाषण में लिपटा हुआ एहसान समेत वो इनाम (या बख्शीश?) मिलना है जो उसकी उस दिन की रोज़ी-रोटी को बर्बाद करता है। एक दूसरे मेहनत-कश आदमी की जेब इसलिए तराशी गयी की एक और कर्मचारी को पुरस्कृत करना था? कौन किसको सराहे? क्या सभी सराहना के योग्य नहीं हैं? हमारे परिवार में जो कमा रहे हैं, उनकी कमाई बर्बाद करी गयी उस बहाने के लिए जिस से एक और कमाने वाले की कमाई का समय बर्बाद हुआ! इस बख्शीश से दोनों में से किसको फायदा हुआ? किसी को नहीं! सिर्फ उस थर्ड पार्टी को हुआ जिसने एक की जेब और दूसरे के मौके को भुनाया! (उनके लिए तो हींग लगा ना फिटकरी रंग भी चोखा आ गया !)

इसके अलावा इस आयोजन में पिजली-पानी का जो अपव्यय हुआ, सो अलग!

 और हम रोते हैं की देश वहीं की वहीं है!  दरअसल हो क्या रहा है हमारे भारत में, की हम जो दिखाते हैं की हम कर रहे हैं, उस से अल्हेदा हमारा अजेंडा यानी की उद्देश्य हो जाता है। जाने कैसे या फिर सोच समझ कर, हम जो कर दिखाने और बताने की कोशिश कर रहे होते हैं, उस से अलग दिशा में हमारे हाथ जा रहे होते हैं, कान आत्म-प्रशंसा पर लगे होते हैं और ज़ुबान जो बोलती है उसके तात्पर्य कई होते हैं!

मुझे बचपन में पढ़ा हुआ वो पाठ नहीं भूलता जो ये सिखाता था की कभी खाली मत बैठो! अपनी सराहना, प्रशंसा, सहमति या असहमति काम कर के दिखाओ न की धरनो और रैलियों में बैठ कर! शायद आपने सुना हो की जापान में अधिक काम कर के अपना विरोध दर्ज़ कराने की परंपरा है। गांधीजी की विचार शैली इस मुद्दे पर स्पष्ट थी की खाली बैठा इंसान शैतान का घर ही होता है। इसलिए उन्होने किसानो को सुझाया की वे लोग सिर्फ एक तरह की फसल की बजाय अलग अलग तरह की फसलें उगाएँ, चरखा चलाएं  और बहोत से नए कमाई के साधन जुटाएँ। उन्होंने वोकेशनल एडुकेशन पर ध्यान देने और उसको जीवन शैली में शामिल कर, विकसित करने पर बल दिया ।

वोकेशनल  एडुकेशन एक बहोत ही आवश्यक परंपरा है। जो किसी कारणवश पढ़-लिख नहीं पाये या जो बच्चे स्कूल से नहीं जुड़ पा रहे हैं उन्हे ऐसे कलाओं में पारंगत करा जाये तथा ऐसे कामों में दक्ष किया जाये जिससे की वो अपनी तथा अपने परिवार की जीविका कमाने का बोझ उठा सकें। उनको पहले अपने परिवार और उसकी भूख  सूझती है न की पढ़ाई। हमारे इस तरफ से आँखें मूँद लेने से समस्या हल नहीं होगी | हम उन्हे पढ़ाई की ओर तक तब आकर्षित नहीं कर सकते जब तक हम उन्हे आत्म-निर्भर न कर दें।  इस तरह पेट भरने के मजबूत तथा स्थायी साधन का इंतेजाम करने के बाद या यूं कहना चाहिए उसके साथ ही ही हम उन्हे वैल्यू-एडुकेशन दे सकते हैं क्यूंकि खाली पेट भजन न होए गोपाला ! मन और पेट भरा होने पर इंसान अपराध की तरफ कम भागता है । हमे फिर से गांधी जी की कही बातों को गौर से पढ़ना-समझना होगा, और ये सीधी सी बात समझनी होगी की समाज में फैलती मानसिक विकृति भी इसी बात का नतीजा है की आजकल एडुकेशन में से मॉरल-साइंस और मॉरल वैल्यूस की किताबें तथा कक्षाएं गैर-ज़रूरी समझ कर खत्म कर दी गयी हैं। बच्चे अगर समझदार होते इतने की स्वयं ही सही-गलत का निर्णय ले पाते तो फिर बच्चे ही क्यूँ कहलाते?

और जो बच्चे बड़े हो गए हैं उन मॉरल-वैल्यूस के बिना, वही ऐसे फालतू आडंबरों में न सिर्फ सबका समय और पैसा बर्बाद करते हैं, बल्कि देश को दिशा-हीन भी करते  हैं। ज़रूरत है की ऐसे  श्रम दिवस से शर्म दिवस बनते अनावश्यक आयोजनो को बंद किया जाये और इस महंगे वक़्त में संसाधन तथा शक्तियों का दुरुपयोग न करते हुये सही जगह पर उसको लगाया जाए। जय हिन्द ।

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